Friday, June 11, 2021

गुरु?

गुरु किसी शरीर का नाम नही और न ही किसी अस्थि, मांस से निर्मित व्यक्ति को ही कहते हैं। गुरु तो वह तत्त्व है जिसके शरीर में ज्ञान की वह चेतना स्थिति है , जो ब्रह्म ज्ञान में लीन है।
चेतन गुरु तो वही होता है, जो देह से परे हैं और सबमें समाये हुए एक पवित्र आत्मिक लौ की तरह सदैव प्रज्ज्वलित हैं। मेरे मतानुसार जीवन्त गुरु की यही व्याख्या है, और सिर्फ ऐसा व्यक्तित्त्व ही गुरु होने के योग्य होता है। लोग अपने मत, पंथ अनुसार गुरु दीक्षा ग्रहण करते है, और करना भी चाहिये।

लेकिन दीक्षा ग्रहण करने पहले यह अवश्य जान लें कि दीक्षा है क्या? 
शिष्य के पूर्ण आत्मसमर्पण और गुरु के पूर्ण आत्मदान रूपी पवित्र संगम को दीक्षा कहते हैं।
साधना जहां जीवन की एक मन्द प्रक्रिया है, वहीं गुरु दीक्षा तत्काल साधक के आध्यात्मिक जीवन में ज्ञान- विज्ञान के परमाणु परिवर्तित कर देने की क्रिया है। 
जिसने अपने आप को सद्गुरु को अपने समाहित कर लिया वही शिष्य एकाकार होकर देवत्त्व प्राप्त कर सकता है।
।।ॐ गुं गुरुभ्यो नमः।।

Thursday, March 18, 2021

तांत्रिकों के आडम्बर

मुझे आज तक एक बात समझ में नही आई की सोशल मीडिया पर बड़े बड़े तांत्रिक बने बैठे लोग, अपनी प्रोफाइल या पोस्ट में शिव-शक्ति की मैथुन क्रिया का चित्र रख देते हैं, या फिर कई बार माँ कामख्या, भैरवी, योगिनी इत्यादि के योनि मुद्रा चित्र रख देते हैं, और ये उसके पीछे पवित्र भाव का दिखावा भी करते हैं।

यदि आप खुद इतने पवित्र हो तो खुद की और खुद की पत्नी की मैथुन क्रिया चित्र क्यों नहीं रख देते हैं ? जिससे की सभी को यह पता चले कि कितनी पवित्रता है आपके मन में मैथुन क्रिया और योनि के प्रति।

अगर आप योनि को इतना पवित्र और पूजनीय ही मानते हो तो खुद की माता की योनि भी प्रोफ़ाइल चित्र में रक्खें ताकि दुनिया भी जाने की ये महापुरुष इसी जगह से प्रकट हुए हैं और वो जगह कितनी पवित्र है।

अगर जगत के माता पिता की इस मुद्रा तस्वीर रख सकते हैं, तो अपने जन्मदाता माँ-बाप की भी इस मुद्रा की तस्वीर भी तो रख ही सकते हैं ये लोग। 

ये सब भी तो कोई वेबसाइट से डाउनलोड हुए नहीं हैं । तब शर्म वाली बात हो जाती है, तब गुप्त रखने वाली बात हो जाती है,  क्यों भाई ऐसा क्यों ? 

अगर कोई किसी से जिज्ञासावश पूछता है, तंत्र के बारे में तो कहते हैं कि ये बड़ी गुप्त विद्या है, हम नहीं बता सकते हैं । 

हम भी मानते है की जो चीज गुप्त रखनी है वो गुप्त ही रखनी चाहिए , तो फिर अपने आराध्य देव,देवी की ऐसी तस्वीरें दिखाकर के स्वयं ही अपने सनातन धर्म का मजाक दुनिया के सामने क्यों बनाते हैं । 

मजाक बना के रख दिया धर्म को ऐसे घटिया सोच वाले लोगों ने। धर्म दिखावा करने की चीज नहीं है । धर्म जीवन में धारण करने की चीज है, न कि प्रदर्शन की।

ऐसे लोगों से एक निवेदन है कि ऐसी आस्था का दिखावा मत कीजिये जिससे धर्म का मजाक बने। मन की पवित्रता मन की ही होती है जो व्यक्ति स्वयं ही जानता है । तो फिर दिखावा क्यों ? 

हम तंत्र औऱ इसकी पवित्र भावना का विरोध नहीं कर रहे है, पर पवित्रता के नाम पर हो रहे धर्म के मजाक का विरोध अवश्य करना चाहते हैं । 

यदि मेरी उपरोक्त बातों से किसी को बुरा लगे तो बहुत ही अच्छा होगा, की कम से कम इनको बुरा लगकर कुछ तो शर्म आएगी जिससे ऐसे लोगों में से कुछ लोग भी सुधर गए तो मेरे इस लेख का उद्देश्य सफल हो जाएगा।

Tuesday, March 9, 2021

नरदेह में जीवन्त पुरुषोत्तम ही अनुसरणीय हैं

नरदेह में जीवन्त पुरुषोत्तम  ही अनुसरणीय हैं।
अहं त्वां सर्व​-पापेभ्यो: मोक्षयिष्यामि मा शुचः:
(गीता १८|६६)
प्रभु कहते हैं कि मेरी शरण में आने पर मैं तुम्हें सभी पापों ( दुष्कर्मों के कर्मफल) से मुक्त दूँगा। यह अभयवाणी है प्रभु की ! तुम चाहे कोई भी क्यों न हो, अपने ह्रदय में मुझे स्थान दो, मुझे प्रेम करो, मुझे  सर्वोपरि बना कर मेरी शरण में आओ, सभी दुर्गुण और उनका प्रभाव तुमसे दूर हो जाएँगे। 

सर्व​ धर्मान् परित्यज्य: माम् एकं शरणं व्रज: 
अहं त्वां सर्व​-पापेभ्यो: मोक्षयिष्यामि मा शुचः।।

भीष्म बड़े fine calibre के व्यक्ति थे. श्रीकृष्ण का सम्मान एक महापुरुष  में हमेशा करते थे।  पर जब उन्होंने देखा कि अपनी शस्त्र उठाने की प्रतिज्ञा तोड़ते हुए श्रीकृष्ण उन्हें मारने दौड़े चले आ रहे हैं तो उनका माथा ठनका ! तत्क्षण उन्होंने समझ लिया कि उनसे अबतक गलती कहाँ हो गयी है। और श्रीकृष्ण कोई महापुरुष -भर नहीं बल्कि पुरुषोत्तम हैं, स्वयं परमपुरुष हैं क्योंकि इस तरह धर्म की रक्षा कोई और नहीं  सकता। इसीलिए वे हाथ जोड़कर प्रार्थना की मुद्रा में बैठ गए और बोले कि हे प्रभु मुझे मार दीजिये !!  ( अर्जुन ने श्रीकृष्ण को  माफ़ी माँगते हुए रोक लिया था. उसकी अलग कथा है.)

अपनी  गलती समझ जाने के बाद भीष्म ने युधिष्ठिर को बुलाकर शिखण्डी वाली सब बातें बताईं कि कैसे उन्हें मारा जा सकता है। अगले दिन शर -शय्या पर लेट गए. 

अब एक रोचक बात सुनिए जो अखण्ड/ असंक्षिप्त महाभारत में वर्णित है। ( मैं अति संक्षेप में बता रहा हूँ.) 

युद्ध शेष  हो गया. शर -शय्या पर लेटे भीष्म श्रीकृष्ण का सुमिरन कर रहे हैं. ठीक उसी समय श्रीकृष्ण विदुर के महल में बिस्तर पर नेत्र मूँदे बैठे हैं. युधिष्ठिर सुबह -सुबह मिलने आये हैं पर श्रीकृष्ण के नेत्र बंद देख प्रतीक्षा में हैं कि वे आँखें खोलें। जब आँखें खुलती हैं तो युधिष्ठिर पूछते हैं -- हे प्रभु, यह किस गंभीर चिंतन में आप हैं ? युद्ध तो कल समाप्त हो गया, अब कैसी चिंता ?!! " 

श्रीकृष्ण कहते हैं -- " भीष्म मेरा ध्यान कर रहे हैं, युद्धिष्ठिर ! आप मेरे साथ उनके पास चलिए।" 

दोनों भीष्म के पास आते हैं. श्रीकृष्ण ने कहा -- "पितामह, युधिष्ठिर अभी राजा बन रहे हैं. आप  इन्हे सारा कुछ समझाईए कि राजा कैसे शासन करे, प्रशासन के नियम क्या हों, दण्ड व्यवस्था काया हो, समाज किन नियमों  जनता क्या -क्या और कैसे -कैसे करे ताकि राजा -प्रजा सभी धर्म मार्ग पर चलें। "  

भीष्म ने उत्तर दिया -- " जब  पुरुषोत्तम परमपुरुष, साक्षात देहधारी परमेश्वर, स्वयं युधिष्ठिर के पास हैं तो आपसे बेहतर कौन बता सकता है ? और सामने मेरी  क्या हैसियत है जो मैं बताऊँ ?"

श्रीकृष्ण -- " पर, पितामह, मैं  चाहता हूँ कि युगों युगों तक आपकी कीर्त्ति और आपका यश स्थापित हो. इसलिए मैं अपना मस्तिष्क आपमें आरोपित करता हूँ. मेरी बातों को आप ही कहिये।" 

इसके बाद भीष्म ने जो कहा उसी से भारतवर्ष में आगे आने वाले कई हज़ार वर्षों तक शासन, प्रशासन, राजनीति अनेक व्रत, त्योहार, कर्त्तव्य, जिम्मेवारियाँ आदि का निर्धारण हुआ. भीष्म ने सतयुग आरम्भ से सारी बात बताई कि  सामाजिक स्थिति कैसी थी, फिर राजनीति और राजा का उद्भव कैसे हुआ और तब से कैसे चला आ रहा है.  बृहद रूप से महाभारत शांति पर्व में है. 

श्रीकृष्ण ने तब यह परम्परा चलाई कि कोई भी सनातन धर्मी जब कभी श्राद्ध या तर्पण करेगा तो भीष्म पितामह को भी अवश्य तर्पण करेगा।  तब से आज तक आर्यों के तर्पण में भीष्म पितामह को तर्पण अवश्य किया जाता है. 

इसलिए भीष्म भीष्म हैं. महान हैं तभी तो गलती समझ गए वर्ना रावण, मेघनाद, द्रोण, कृपाचार्य, कर्ण ऐसे महाज्ञानी भी परमपुरुष श्री राम, श्रीकृष्ण की शरण न ले सके. 

" विस्तार है अपार, प्रजा दोनों पार
करे हाहाकार, निःशब्द सदा
ओ गंगा तुम, गंगा बहती हो क्यों ?
उन्मद अवनी कुरुक्षेत्र बनी
गंगे जननी ! नव भारत में भीष्म-रूपी सुत समरजयी, 
जनती नहीं हो क्यों ?"

( भूपेन हजारिका का गाया प्रसिद्ध गीत)

शांति पर्व के उक्त प्रसंग में सबकुछ सुनने के बाद युधिष्ठिर ने विस्मय में आकर भीष्म से पूछा:

युधिष्ठिर उवाच ---

किमेकं दैवतं लोके किं वाप्येकं परायणम्। स्तुवन्तः कं कमर्चन्तः प्राप्नुयुर्मानवाः शुभम्॥८॥
को धर्मः सर्वधर्माणां भवतः परमो मतः। किं जपन्मुच्यते जन्तुर्जन्मसंसारबन्धनात्॥९॥

"सभी लोकों में सर्वोत्तम देवता कौन है और किस एक का परायण किया जाए ? 
धर्म कौन है ? किसको जपने से जीव को संसार के बंधन से मुक्ति मिलती है?"

इसके उत्तर में जो भीष्म ने श्रीकृष्ण के बारे में कहा वह 'विष्णु सहस्रनाम' के रूप में प्रसिद्ध है।

भीष्म उवाच ---

जगत्प्रभुं देवदेवमनन्तं पुरुषोत्तमम्।
स्तुवन नामसहस्रेण पुरुषः सततोत्थितः॥१०॥  

योगो योगविदां नेता प्रधानपुरुषेश्वरः।
नारसिंहवपुः श्रीमान् केशवः पुरुषोत्तमः॥३॥

सर्वगः सर्वविद्भानुर्विष्वक्सेनो जनार्दनः।
वेदो वेदविदव्यङ्गो वेदाङ्गो वेदवित् कविः॥१४॥

सद्गतिः सत्कृतिः सत्ता सद्भूतिः सत्परायणः।
शूरसेनो यदुश्रेष्ठः सन्निवासः सुयामुनः॥७५॥

भूतावासो वासुदेवः सर्वासुनिलयोऽनलः।
दर्पहा दर्पदो दृप्तो दुर्धरोऽथापराजितः॥७६॥

आत्मयोनिः स्वयंजातो वैखानः सामगायनः।
देवकीनन्दनः स्रष्टा क्षितीशः पापनाशनः॥१०६॥

विष्णु सहस्रनाम के प्रत्येक नाम-गुणों की व्याख्या जो आदि शंकराचार्य ने की है वह सबको पढ़नी चाहिए। 

वन्दे पुरुषोत्तमम् ।

Sunday, January 31, 2021

"हनुमान जी की प्रतिज्ञा


´´र´´ कार का अनुसंधान करके तो देख। पूर्वकृत कर्मों का नाश न कर दूं तो कहना।।
राम नाम को अपने ध्यान में बसाकर तो देख। तुझे मूल्यावान न बना दूं तो कहना।।
´´ अ´´ कार का अनुसंधान करके तो देख। अन्त:करण का अन्धकार न मिटा दूं तो कहना।।
राम नाम का मनन करके तो देख। ज्ञान के मोती तूझ में न भर दूं तो कहना।।
´´म´´ कार का अनुुसंधान करके तो देख। अमृतानन्द की वर्षा न कर दूं तो कहना।।
राम नाम को सहारा बना कर देख। तुम्हें सबकी गुलामी से न छुड़ां दूं तो कहना।।
´´र´´ ´अ´ ´म´ को मिलाकर ´राम´ लिख। जीवन मरण से मुक्त न करा दूं तो कहना।।
रामनामानुराग में आँसू बहा कर तो देख। तेरे जीवन में आनन्द की नदियां न बहा दूं तो कहना।।
राम नाम लिखना तो सिखो। कहां से कहां न पंहुचा दूं तो कहना।।
राम नाम का प्रचारक बन के तो देख। तुझे किमती न बना दूं तो कहना।।
जप मार्ग पर पैर रख कर तो देख। तेरे लिये सब मार्ग न खोल दूं तो कहना।।
भक्तिमयी राहों पर चलकर तो देख। तुझे शान्ति दूत न बना दूं तो कहना।।
राम नाम के लिये खर्च करके तो देख। कुबेर के भण्डार न खोल दूं तो कहना।।
राम नाम पर खुद को न्यौछावर करके तो देख। पूरा संसार न्यौछावर न कर दूं तो कहना।।
राम नाम सुन के सुना के तो देख। कृपा और कृपा न बरसा दूं तो कहना।।
´´राम´´ नाम का लिखित जप करके तो देख। माया से मुक्त न करा दूं तो कहना।।
राम नाम की तरफ हाथ बढ़ाकर तो देख। दौड़ कर गले न लगा लू तो कहना।।
राम नाम का तू बन के तो देख। हर एक को तेरा न बना दूं तो कहना।।

मानव जीवन का यथार्थ सत्य

मैंने हर रोज जमाने को रंग बदलते देखा है।
उम्र के साथ जिंदगी को ढंग बदलते देखा है ।
वो जो चलते थे तो शेर के चलने का होता था गुमान, उनको भी पाँव उठाने के लिए सहारे को तरसते देखा है ।
जिनकी नजरों की चमक देख सहम जाते थे लोग , उन्ही नजरों को बरसात की तरह रोते देखा है ।
जिनके हाथों के जरा से इशारे से टूट जाते थे पत्थर , उन्ही हाथों को पत्तों की तरह थर थर काँपते देखा है ।
जिनकी आवाज़ से कभी बिजली के कड़कने का होता था भरम,उनके होठों पर भी जबरन चुप्पी का ताला लगा देखा है ।
ये जवानी ये ताकत ये दौलत सब कुदरत की इनायत है, इनके रहते हुए भी इंसान को बेजान हुआ देखा है ।
अपने आज पर क़भी ना इतराना दोस्तों वक्त की धारा में अच्छे अच्छों को मजबूर हुआ देखा है।
कर सकते हो , तो किसी को खुश करो दुःख देते तो हजारों को देखा है।

Tuesday, January 5, 2021

ब्रह्म

ब्रह्म हिन्दू दर्शन में इस सारे विश्व का परम सत्य है और जगत का सार है ... वो ब्रह्माण्ड की आत्मा है .. वो ब्रह्माण्ड का कारण है, जिससे ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति होती है , जिसमें ब्रह्माण्ड आधारित होता है और अन्त मे जिसमें विलीन हो जाता है ..वो अद्वितीय है ..वो स्वयं ही परमज्ञान है, और प्रकाश-स्त्रोत है ... वो निराकार, अनन्त, नित्य और शाश्वत है ... ब्रह्म सर्वशक्तिमान और सर्वव्यापी है...
 परब्रह्म :- परब्रह्म या परम-ब्रह्म ब्रह्म का वो रूप है, जो निर्गुण और असीम है ... "नेति-नेति" करके इसके गुणों का खण्डन किया गया है, पर ये असल मे अनन्त सत्य, अनन्त चित और अनन्त आनन्द है .. अद्वैत वेदान्त में उसे ही परमात्मा कहा गया है, ब्रह् ही सत्य है,बाकि सब मिथ्या है... 'ब्रह्म सत्यम जगन मिथ्या,जिवो ब्रम्हैव ना परः ,वह ब्रह्म ही जगत का नियन्ता है... 
 अपरब्रह्म:-  अपरब्रह्म ब्रह्म का वो रूप है, जिसमें अनन्त शुभ गुण हैं ... वो पूजा का विषय है, इसलिये उसे ही ईश्वर माना जाता है .. अद्वैत वेदान्त के मुताबिक ब्रह्म को जब इंसान मन और बुद्धि से जानने की कोशिश करता है, तो ब्रह्म माया की वजह से ईश्वर हो जाता है .....ब्रह्माण्ड का जो भी स्वरूप है वही ब्रह्म का रूप या है ..वह अनादि है, अनन्त है जिस तरह प्राण का शरीर में निवास है वैसे ही ब्रह्म का शरीर यानि ब्रह्माण्ड में निवास है ... वह कण-कण में व्याप्त है, अक्षर है, अविनाशी है, अगम है, अगोचर है, शाश्वत है , सत्य है ...ब्रह्म के प्रकट होने के चार स्तर हैं - ब्रह्म , ईश्वर, हिरण्यगर्भ एवं विराट ... भौतिक संसार विराट है, बुद्धि का संसार हिरण्यगर्भ है, मन का संसार ईश्वर है तथा सर्वव्यापी चेतना का संसार ब्रह्म है ... ‘सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म’:- ब्रह्म सत्य और अनन्त ज्ञान-स्वरूप है ... इस विश्वातीत रूप में वह उपाधियों से रहित होकर निर्गुण ब्रह्म या परब्रह्म परमात्मा कहलाता है ... जब हम जगत् को सत्य मानकर ब्रह्म को सृष्टिकर्ता, पालक, संहारक, सर्वज्ञ आदि उपाधियों से संबोधित करते हैं तो वह सगुण ब्रह्म या ईश्वर कहलाता है .. इसी विश्वगत रूप में वह उपास्य है ... ब्रह्म के व्यक्त स्वरूप (माया या सृष्टि) में बीजावस्था को हिरण्यगर्भ अर्थात सूत्रात्मा कहते हैं .. आधार ब्रह्म के इस रूप का अर्थ है सकल सूक्ष्म विषयों की समष्टि ... जब माया स्थूल रूप में अर्थात् दृश्यमान विषयों में अभिव्यक्त होती है तब आधार ब्रह्म वैश्वानर या विराट कहलाता है ...
...परब्रह्म परमात्मा को प्राप्त होने के लिए सत्य का अनुशरण और जीव मात्र के प्रति प्रेम की ज्योति प्राणों में जल जाना आत्मा किसी काल में न तो जन्मता और न मरता है; क्योंकि यह वस्त्र ही तो बदलता है। न यह आत्मा होकर अन्य कुछ होनेवाला है; क्योंकि यह अजन्मा है, नित्य है, शाश्वत और पुरातन है। शरीर के नाश होने पर भी इसका नाश नहीं होता। आत्मा सत्य है, आत्मा ही पुरातन है, आत्मा शाश्वत और सनातन है। आप कौन हैं? सनातन धर्म के अनुयायी। सनातन कौन है? आत्मा। आप आत्मा के अनुयायी हैं। आत्मा, परमात्मा और ब्रह्म एक दूसरे के पर्याय हैं। आप कौन हैं? शाश्वत धर्म के उपासक। शाश्वत कौन है? आत्मा। अर्थात् हम - आप आत्मा के उपासक हैं। यदि आप आत्मिक पथ को नहीं जानते तो आपके पास शाश्वत - सनातन नाम की कोई वस्तु नहीं है। उसके लिये आप आहेँ भरते हैं तो प्रत्याशी अवश्य हैं; किन्तु सनातनधर्मी नहीं हैं। सनातन धर्म के नाम पर किसी कुरीति के शिकार हैं।

देश - विदेश में, मानवमात्र में आत्मा एक ही जैसा है। इसलिये विश्व में कहीं भी कोई आत्मा की स्थिति दिलानेवाली क्रिया जानता है और उस पर चलने के लिये प्रयत्नशील है तो वह सनातनधर्मी है, चाहे वह अपने को ईसाई, मुसलमान, यहूदी या कुछ भी क्यों न कह ले।

पार्थिव शरीर को रथ बनाकर ब्रह्मरूपी लक्ष्य पर अचूक निशाना लगानेवाला पृथापुत्र अर्जुन ! जो पुरुष इस आत्मा को नाशरहित, नित्य, अजन्मा और अव्यक्त जानता है, वह पुरुष कैसे किसी को मरवाता है और कैसे किसी को मारता है? अविनाशी का विनाश असंभव है। अजन्मा जन्म नहीं लेता। अतः शरीर के लिये शोक नहीं करना चाहिये। इसी को उदाहरण से स्पष्ट करते हैं -

जैसे मनुष्य ' जीर्णानि वासांसि' - जीर्ण - शीर्ण पुराने वस्त्रों को त्यागकर नये वस्त्रों को ग्रहण करता है, ठीक वैसे ही यह जीवात्मा पुराने शरीरोँ को त्यागकर दूसरे नये शरीरोँ को धारण करता है। जीर्ण होने पर ही नया शरीर धारण करना है, तो शिशु क्यों मर जाते हैं? यह वस्त्र तो और विकसित होना चाहिये। वस्तुतः यह शरीर संस्कारों पर आधारित है। जब संस्कार जीर्ण होते हैं तो शरीर छूट जाता है। यदि संस्कार दो दिन का है तो दूसरे दिन जीर्ण हो गया। इसके बाद मनुष्य एक श्वास भी अधिक नहीं जीता। संस्कार ही शरीर है। आत्मा संस्कारों के अनुसार नया शरीर धारण कर लेता है- 'अथ खलु क्रतुमयः पुरुषो यथा क्रतुरस्मिँल्लोके पुरुषो भवति तथेतः प्रेत्य भवति।' (छान्दोग्योपनिषद्, ३/१४) अर्थात् यह पुरुष निश्चय ही संकल्पमय है। इस लोक में पुरुष जैसा निश्चयवाला होता है, वैसा ही यहाँ से मरकर जाने पर होता है। अपने संकल्प से बनाये हुए शरीरोँ में पुरुष उत्पन्न होता है। इस प्रकार मृत्यु शरीर का परिवर्तन मात्र है। आत्मा नहीं मरता। पुनः इसकी अजरता - अमरता पर बल देते हैं -

अर्जुन ! इस आत्मा को शस्त्रादि नहीं काटते, अग्नि इसे जला नहीं सकती, जल इसे गीला नहीं कर सकता और न वायु इसे सुखा ही सकता है।

यह आत्मा अच्छेद्य है- इसे छेदा नहीं जा सकता, यह अदाह्य है- इसे जलाया नहीं जा सकता, यह अक्लेद्य इसे गीला नहीं किया जा सकता, आकाश इसे अपने में समाहित नहीं कर सकता। यह आत्मा निःसंदेह अशोष्य, सर्वव्यापक, अचल, स्थिर रहनेवाला और सनातन है।

अविनाशी, अप्रमेय, नित्यस्वरूप आत्मा के ये सभी शरीर नाशवान् कहे गये हैं, इसलिये भरतवंशी अर्जुन ! आत्मा ही अमृत है। आत्मा ही अविनाशी है, जिसका तीनों काल में नाश नहीं होता। आत्मा ही सत् है। शरीर नाशवान् है यही असत् है, जिसका तीनों काल में अस्तित्व नहीं है।

 है ....
.... ॐ परब्रह्म परमात्मने नमः,उत्पत्ति ,स्थिति ,प्रलाय्कारय, ब्रह्महरिहराय, त्रिगुन्त्माने सर्वकौतुकानी दर्शन-दर्शय दत्तात्रेयाय नमः .....

तत्त्व ज्ञान

 ..प्रायः प्रत्येक साधक के भीतर यह जिज्ञासा रहती है कि तत्त्वज्ञान क्या है ? तत्त्वज्ञान सुगमता से कैसे हो सकता है ? आदि। इस जिज्ञासाकी पूर्ति करने के लिये प्रस्तुत लेख  जिज्ञासुओं  के लिये बड़े उपयोगी  है.. इसके अंतर्गत जो बातें आती  हैं, वे केवल सीखने-सिखाने की, सुनने-सुनाने की या पढने पढ़ाने के लिए  नहीं हैं, बल्कि  अनुभव करने की हैं.. दूर से देखने में तो कठिन दीखता है, पर प्रवेश करने पर बड़ा ही सुगम और रसीला है..परमात्मतत्त्व की खोज में लगे हुए जिज्ञासुओं से प्रार्थना है, कि वे तत्त्व ज्ञान का अध्ययन-मनन करें और तत्त्व का अनुभव करें.. सबसे पहले हमें यह जानना होगा की तत्त्व हैं क्या ..तभी हमें उनका यथार्थ ज्ञान हो सकेगा ..
  वेदों का ऐसा मानना  है कि सृष्टि का निर्माण 24 तत्वों से मिलकर हुआ है इनमें पांच ज्ञानेद्रियां (आंख,नाक, कान,जीभ,त्वचा)  पांच कर्मेन्द्रियां  (गुदा,लिंग,हाथ,पैर,वचन)  तीन अंहकार (सत, रज, तम)  पांच तन्मात्राएं   (शब्द,रूप,स्पर्श,रस,गन्ध) पांच तत्व (धरती, आकाश,वायु, जल,तेज)  और एक  मन  शमिल है... इन्हीं चौबीस तत्वों से मिलकर ही पूरी सृष्टि और मनुष्य का निर्माण हुआ है....                                                            

भगवान् श्रीकृष्ण के अनुसार हमारा स्वरूप चिन्मय सत्तामात्र है और उसमें अहम् नहीं है—यह बात यदि समझ में आ जाय तो इसी क्षण जीवनमुक्ति है ...इसमें समय लगने की बात नहीं है...समय तो उसमें लगता है, जो अभी नहीं और जिसका निर्माण करना है... जो अभी है, उसका निर्माण नहीं करना है, प्रत्युत उसकी तरफ दृष्टि डालनी है, उसको स्वीकार करना है जैसे—संकर सहज सरूपु सम्हारा। लागि समाधि अखंड अपारा....दो अक्षर हैं—‘मैं हूँ’...इसमें ‘मैं’ प्रकृति का अंश है, और ‘हूँ’ परमात्मा का अंश है, ‘मैं’ जड़ है और ‘हूँ’ चेतन है.. ‘मैं’ आधेय है और ‘हूँ’ आधार है.. ‘मैं’ प्रकाश्य है और ‘हूँ’ प्रकाशक है.. ‘मैं’ परिवर्तनशील है और ‘हूँ’ अपरिवर्तनशील है... ‘मैं’ अनित्य है और ‘हूँ’ नित्य है... ‘मैं’ विकारी है और ‘हूँ’ निर्विकार है.. ‘मैं’ और ‘हूँ’ को मिला लिया..यही चिज्जडग्रन्थि  (जड़-चेतन की ग्रन्थि)  है, यही बन्धन है, यही अज्ञान है.. ‘मैं’ और ‘हूँ’ को अलग-अलग अनुभव करना ही मुक्ति है तत्त्वबोध है... यहाँ इस वाक्य पर ध्यान केन्द्रित करना  आवश्यक है , कि ‘मैं’ को साथ मिलाने से ही ‘हूँ’ कहा जाता है... अगर ‘मैं’ को साथ न मिलायें तो ‘हूँ’ नहीं रहेगा, बल्कि  ‘है’ रहेगा.. वह ‘है’ ही अपना स्वरूप है...निर्ममो निरहंकारः स शान्तिमधिगच्छति।।....एक ही व्यक्ति अपने बापके सामने कहता है कि ‘मैं बेटा हूँ’, बेटे के सामने कहता है कि ‘मैं बाप हूँ’, दादा के सामने कहता है कि ‘मैं पोता हूँ’, पोता के सामने कहता है कि ‘मैं दादा हूँ’, बहन के सामने कहता है कि ‘मैं भाई हूँ’, पत्नी से के सामने कहता है कि ‘मैं पति हूं’, आदि.. तात्पर्य है कि बेटा, बाप, पोता, दादा, भाई, पति,  आदि तो अलग-अलग हैं, पर ‘हूँ’ सबमें एक है.. ‘मैं’ तो बदला है, पर ‘हूँ’ नहीं बदला...वह ‘मैं’ बाप के सामने बेटा हो जाता, बेटे के सामने बाप हो जाता है , अर्थात् वह जिसके सामने जाता है, वैसा ही हो जाता है... अगर उससे पूछें कि ‘तू कौन है’ तो उसको खुद का पता नहीं है .. यदि ‘मैं’ की खोज करें तो ‘मैं’ मिलेगा ही नहीं, प्रत्युत सत्ता मिलेगी...कारण कि वास्तव में सत्ता ‘है’ की ही है, ‘मैं’ की सत्ता है ही नहीं... बेटे की अपेक्षा बाप है, बापकी अपेक्षा बेटा है—इस प्रकार बेटा, बाप, पोता, दादा आदि नाम अपेक्षासे (सापेक्ष) हैं; अतः ये स्वयं के नाम नहीं हैं... स्वयं का नाम तो निरपेक्ष ‘है’ है.. वह ‘है’ ‘मैं’ को जाननेवाला है... ‘मैं’ जाननेवाला नहीं है ..और जो जाननेवाला है, वह ‘मैं’ नहीं है.. ‘मैं’ ज्ञेय      (जानने में आनेवाला )  है और ‘है’ ज्ञाता  (जाननेवाला)  है.. ‘मैं’ एकदेशीय है और उसको जानने वाला ‘है’ सर्वदेशीय है... ‘मैं’ से सम्बन्ध मानें या न मानें, ‘मैं’ की सत्ता नहीं है.. सत्ता ‘है’ की ही है... परिवर्तन ‘मैं’ में होता है, ‘है’ में नहीं... ‘हूँ’ भी वास्तव में ‘है’ का ही अंश है.. ‘मैं’ पन को पकड़ने से ही वह अंश है.. अगर मैं-पन को न पकड़ें तो वह अंश  (‘हूँ’)  नहीं है, अपितु  ‘है’  (सत्ता मात्र है)  ‘मैं’ अहंता और ‘मेरा बाप, मेरा बेटा’ आदि ममता है.....अहंता-ममतासे रहित होते ही मुक्ति है—......
यही ‘ब्राह्मी स्थिति’ है....इस ब्राह्मी स्थितिको प्राप्त होनेपर अर्थात् ‘है’ में स्थिति का अनुभव होने पर शरीर का कोई मालिक नहीं रहता अर्थात् शरीर को मैं—मेरा कहनेवाला कोई नहीं रहता.........मनुष्य है, पशु है, पक्षी है, ईंट है, चूना है, पत्थर है— अनु  है परमाणुहै , सजीव है , निर्जीव है , प्रकाश है , अन्धकार है .. इस प्रकार वस्तुओं में तो फर्क है, पर ‘है’ में कोई फर्क नहीं है... ऐसे ही मैं मनुष्य हूँ,  मैं देवता हूँ,  मैं पशु हूँ,  मैं पक्षी हूँ—इस प्रकार मनुष्य आदि योनियाँ तो बदली हैं, पर स्वयं नहीं बदला है.. अनेक शरीरों में, अनेक अवस्थाओं में चिन्मय सत्ता एक है.... बालक, जवान और वृद्ध—ये तीनों अलग-अलग हैं, पर तीनों अवस्थाओं में सत्ता एक ही  है... कुमारी, विवाहिता और विधवा—ये तीनों अलग-अलग हैं, पर इन तीनोंमे सत्ता एक ही है..... जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति, मूर्च्छा और समाधि—ये पाँचों अवस्थाएं अलग-अलग हैं, पर इन पाँचों में सत्ता एक ही  है... अवस्थाएँ बदलती हैं, पर उनको जाननेवाला नहीं बदलता.. ऐसे ही मूढ़, क्षिप्त, विक्षिप्त, एकाग्र, और निरुद्ध—इन पाँचों वृत्तियों में फर्क पड़ता है, पर इनको जाननेवाले में कोई फर्क नहीं पड़ता....एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति।
स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति।।...... इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं ....
‘हे पार्थ ! यह ब्राह्मी स्थिति है... इसको प्राप्त होकर कभी कोई सम्मोहित नहीं होता, इस स्थिति में यदि अन्तकाल में भी स्थित हो जाय तो निर्वाण  (शान्त)  ब्रह्म की प्राप्ति हो जाती है.......’
यदि जाननेवाला भी परिवर्तित हो  जाय तो इनकी गणना कौन करेगा ?  सबके परिवर्तन का ज्ञान होता है, पर स्वयंके परिवर्तन का ज्ञान कभी किसी को नहीं होता...सबका इदं ता से भान होता है, पर अपने स्वरूप का इदं ता से भान कभी किसी को नहीं होता, सबके अभाव का ज्ञान होता है, पर अपने अभाव का ज्ञान कभी किसी को नहीं होता... इसलिए  ‘है’ (सत्तामात्र)  में हमारी स्थित स्वतः है, करनी नहीं है..बल्कि है... भूल यह होती है कि हम ‘संसार है’—इस प्रकार ‘नहीं’ में ‘है’ का आरोप कर लेते हैं.. ‘नहीं’ में ‘है’ का आरोप करने से ही ‘नहीं’ (संसार) की सत्ता दीखती है, और ‘है’ की तरफ दृष्टि नहीं जाती.. वास्तव में ‘है में संसार’—इस प्रकार ‘नहीं’ में ‘है’ का अनुभव करना चाहिये,.... ‘नहीं’ में ‘है’  का अनुभव करने से ‘नहीं’ नहीं रह जाएगा  और 
 रह जाएगा केवल है``..  और इसी ``है`` को पर्ब्रह्म्पर्मात्मा कहते हैं ... नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः।.........असत् की सत्ता विद्यमान नहीं है, अर्थात् असत्का अभाव ही विद्यमान है, और इसी प्रकार सत् का अभाव विद्यमान नहीं है, अर्थात् सत् का भाव ही विद्यमान है...’
एक ही देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, अवस्था, परिस्थिति आदि में अपनी जो  सत्ता दीखती है, वह अहम्  (व्यक्तित्व)  को लेकर ही दीखती है.. जबतक अहम रहता है, तभी तक मनुष्य अपने को एक देश, काल आदि में देखता है... अहम् के मिटने पर एक देश, काल आदि में परिच्छिन सत्ता नहीं रहती, बल्कि  अपरिच्छिन्न सत्तामात्र रहती है...

वास्तव में अहम है नहीं, केवल उसकी मान्यता है.... सांसारिक पदार्थों की जैसी सत्ता प्रतीत होती है, वैसी सत्ता भी अहम् की नहीं है... सांसारिक पदार्थ तो उत्पत्ति-विनाशवाले हैं, पर अहम् उत्पत्ति-विनाशवाला भी नहीं है... इसलिये तत्त्वबोध होने पर शरीरादि पदार्थ तो रहते हैं, पर अहम् मिट जाता है...
अतः तत्त्वबोध होने पर ज्ञानी नहीं रहता, अपितु  ज्ञानमात्र रह्जाता  है.......इसलिये आजतक कोई ज्ञानी हुआ नहीं, ज्ञानी है नहीं, ज्ञानी होगा भी नहीं और ज्ञानी होना सम्भव ही नहीं... अहम् ज्ञानी में होता है, ज्ञान में नहीं...... अतः ज्ञानी नहीं है,   ज्ञानमात्र है,  सत्तामात्र है..... उस ज्ञानका कोई ज्ञाता नहीं है, कोई धर्मी नहीं है, मालिक नहीं है.... कारण कि वह ज्ञान स्वयंप्रकाश है, अतः स्वयं से ही स्वयं का ज्ञान होता है... और यह प्रक्रिया ब्रहमांड के कण - कण में होती है ,  .. अज्ञान का मिट जाने से ही परमात्मा से मिलन होता है , और इसी अवस्था को तत्त्व का तत्त्व में विलय हो जाना , सत्य कहीं से आता नहीं है , असत्य का नाश हो जाता है , 
 वास्तव में ज्ञान होता नहीं है, बल्कि  अज्ञान मिटता है.. अज्ञान मिटाने को ही तत्त्वज्ञान कहते  हैं... ... 
और यही तत्त्व ज्ञान श्री कृष्ण जी ने अर्जुन और उद्धव को प्रदान किया था.... ॐ पर-ब्रह्मपर्मात्मने नमः ......