Sunday, November 29, 2020

अखंड हिंदुस्तान

बिखरे हैं यहाँ मोती, माला बनाए कौन।
नफरत की आंधीयों मे, दीपक जालाए कौन।। 

यादव कोई, दलित कोई, पंडित, कोई कहार।
इस जात पात ने किया हिन्दुत्व पर प्रहार।। 

सिख, है कोई मलयाली, गुजरात का कोई। 
झगड़ा कोई भाषा का, क्षेत्रवाद का कोई।।

हम भूल गए उसको, जननी जो हमारी है।
हम सब हैं लाल इसके, ये मात हमारी है।।

हम हिन्दू, हम हिन्दुस्तानी, धर्म सनातन एक।
एक डाल के हम सब पंछी, यही घरौंदा नेक।।

राष्ट्र धर्म की रक्षा मे, दुश्मन के शीश कुचल देंगे।
इतिहास की हस्ती क्या है, हम सब तो भूगोल बदल देंगे।। 

हिन्दू प्रचंड हों हिंदुस्तान अखंड हो, अब नारा यही हमारा है।
हम हिन्दू हैं, हम हिन्दी हैं और हिंदुस्तान हमारा है।।

Tuesday, November 17, 2020

धर्म का स्वरुप

धर्म का स्वरूप क्या है? धर्म का क्या महत्व है? क्या धर्म देश-काल के अनुसार बदलता है? ये सवाल हजारों सालों से पूरी दुनिया को परेशान करते रहे हैं। 

भारतीय संस्कृति में धर्म पर चिंतन कर सूक्ष्म विवेचन की परंपरा रही है। धर्म संपूर्ण जगत को धारण करता है, इसीलिए उसका नाम धर्म है। धर्म ने समस्त प्रजा को धारण कर रखा है। अत: जो धारण से युक्त हो, वही धर्म है।संसार में धर्म ही सबसे श्रेष्ठ है। 

धर्म में ही सत्य की प्रतिष्ठा है। मरा हुआ धर्म हमें मारता है और हमसे रक्षित धर्म ही हमारी रक्षा करता है। इसलिए धर्म का हनन नहीं करना चाहिए।

यही सनातन भारतीय चिंतन परंपरा है, जो मानव जीवन के चार पुरुषार्थो में धर्म को पहला स्थान देती है। धर्म ही वह पहली सीढी है, जिसके अगले सोपानों में अर्थ और काम से होते हुए मानव अपने जीवन के परमलक्ष्य मोक्ष को प्राप्त कर सकता है। यह है " सनातन धर्म"।

मनुस्मृति में धर्म का स्वरूप उसके दस लक्षणों के माध्यम से बताया गया है -

धृति: क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिंद्रियनिग्रह:।

धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्॥

अर्थात धैर्य, क्षमा, संयम, अस्तेय (चोरी न करना), शौच (पवित्रता), इंद्रियों को वश में रखना, बुद्धि, विद्या, सत्य और क्रोध न करना - ये दस लक्षण हैं धर्म के और जिस मनुष्य में ये लक्षण हों, वही धार्मिक है। यही है सनातन धर्म का अनुयायी होना।

सन 1893 में स्वामी विवेकानंद ने शिकागो में आयोजित विश्व धर्म महासम्मेलन में उपस्थित विश्व के सभी धर्मगुरुओं के समक्ष भारतीय संस्कृति की विजय पताका फहराई।

उन्होंने बार-आर भारतीय जीवनदृष्टि का मूल आधार धर्म को बताया। उनके शब्दों में, हमारे पास एकमात्र सम्मिलन-भूमि है - हमारी पवित्र परंपरा, हमारा धर्म। भारत के भविष्य संगठन की पहली शर्त के तौर पर धार्मिक एकता की ही आवश्यकता है। 

एशिया में और विशेषत: भारत में जाति, भाषा, समाज संबंधी सभी बाधाएं धर्म की इस एकीकरण शक्ति के सामने उड जाती हैं। धर्म ही भारतीय जीवन का मूल मंत्र है। हमारा धर्म ही हमारे तेज, हमारे बल, यहां तक कि हमारे जीवन की भी मूल भित्ति है। 

मैं एक ऐसे धर्म का प्रचार करना चाहता हूं, जो सब प्रकार की मानसिक अवस्था वाले लोगों के लिए उपयोगी हो; इसमें ज्ञान, भक्ति, योग और कर्म समभाव से रहेंगे। 

हमारा देश ही हमारा जागृत देवता है। देश के दरिद्रनारायण की सेवा ही सच्चा धर्म है। क्षुधातुरों को धर्म का उपदेश देना उनका अपमान करना है, भूखों को दर्शन सिखाना उनका अपमान करना है। 

इस प्रकार स्वामी विवेकानंद ने धर्म को सामाजिक विकास तथा मानवमात्र की सेवा से जोडकर उसे नया अर्थ प्रदान किया। ऐसा है हमारा "सनातन धर्म"।

धर्म कभी धन के लिए न आचरित हो, वह श्रेय के लिए हो, प्रकृति के कल्याण के लिए हो, धर्म के लिए हो। इसका अनुपालन करना है "सनातन धर्म"।

परंतु आज भौतिकता के इस दौर में धर्म के नाम पर कई जगह व्यापार शुरू हो गया है। 

आज कई ऐसे लोग आस्था-विश्वास के बाजार में आ बैठे हैं, जो शास्त्रों की मनमानी व्याख्या करते हैं। ढोंग-आडंबर का कपटजाल बिछाते हैं। आस्तिक एवं सीधे-सादे नागरिकों को फंसाते और अपने स्वार्थ साधते हैं। 

वास्तव में साधू शब्द का अर्थ है - जिसने अपनी इंद्रियों को साध (वश में कर) लिया हो ।

 महात्मा शब्द का अर्थ है- महान है जो आत्मा।

 गुरु शब्द दो अक्षरों - गु (अंधकार) और रु (मिटाने वाला) के मेल से बना है, अर्थात गुरु वह है, जो अज्ञान के अंधकार को मिटाकर ज्ञान के सही मार्ग पर ले चले, किंतु आज क्या स्थिति है, यह किसी से छिपा नहीं है।

स्वतंत्रता के बाद भारत में धर्म का जितना दुरुपयोग राजनीति ने किया, शायद ही किसी और ने किया हो। धर्म के नाम पर संकीर्ण सोच को बढावा देने, लोगों को एक-दूसरे के खिलाफ भडकाने जैसे घृणित कार्य किए गए। फिर भी अपनी निर्मलता और श्रेष्ठता को स्थिर रखे हुए है वह है, "सनातन धर्म"।

 कोई भी धर्म बैर भाव, घृणा, हिंसा आदि नहीं सिखाता। सभी धर्म प्रेम, भाईचारा, सद्भाव, सहनशीलता, मेलजोल की ही सीख देते हैं। 

सभी पर्व असत्य पर सत्य, अधर्म पर धर्म की विजय की ही गाथा गाते हैं, फिर भी हम आधुनिक वैज्ञानिक शिक्षित समाज में धर्म के नाम पर हो रहे इन सारे छल, कपट, अन्याय, अत्याचार को बर्दाश्त कर रहे हैं? 

जरूरत इस बात की है कि हम स्वयं यह प्रण लें कि धर्म के नाम पर कट्टरता, कटुता, द्वेष-घृणा फैलाने वाली ताकतों के नापाक इरादों को कभी सफल नहीं होने देंगे तथा पूरे विश्व के सभी धर्मो को सम्मान देने वाली धर्म की धरा - भारतवर्ष को एक बार फिर से जाग्रत करेंगे। इस प्रतिज्ञा पर अडिग रहना सिखाता है, " सनातन धर्म"।

 हमारा सबका सनातन धर्म ही वास्तविक धर्म है, यह बात हम सब को समझनी होगी। तभी हमारे भारत से ही पुन: पूरे विश्व को शांति, अहिंसा, सदाचार का संदेश मिलेगा। यही अवधारणा है "सनातन धर्म की"।

 "प्राणी मात्र को निम्नतम से उच्चतम की तरफ अग्रसर करना" दैहिक, दैविक और भौतिक, मानसिक, वाचिक और क्रमिक हर तरह से सन्मार्ग की तरफ उन्मुख करना, सन्मार्ग के लिए प्रेरित करना। जो यह कार्य करने के लिए प्रेरित करे वह है,"सनातन धर्म"।
।।जयति सनातन धर्म।।

Tuesday, November 3, 2020

आध्यत्मिकता

 एक बात पानी से सीखी जा सकती है ; छोटी छोटी नदियाँ शोर मचाती हैं परन्तु महासागर शांत रहता है।
जो वेद और शास्त्र के ग्रंथों को याद कर लेता है , किंतु उनके यथार्थ तत्व को नहीं समझता, उसका वह याद रखना व्यर्थ है। 
जो बाहर की सुनता है बिखर जाता है, जो अपने अंदर की सुनता है सवर जाता है, और आध्यात्मिकता अंदर से आती है। – 
जिस दिन हमारा मन परमात्मा को याद करने, और उसमे दिलचस्पी लेना शुरू कर देता है उसी दिन से हमारी परेशानियाँ भी हम में दिलचस्पी लेना बंद कर देती हैं। इंसान बुरा तब बनता है जब वो खुद  को दूसरों से ज्यादा अच्छा मानने लग जाता है। इंसान बुरा तब बनता है जब वो खुद  को दूसरों से ज्यादा अच्छा मानने लग जाता है। हमें यह कभी नहीं देखता चहियड कि हमने  कितना एच् अच्छा क्या किया गया है; बल्कि हमें केवल यह  देखना चहियड हूं कि और क्या अच्छा किया जाना बाकी है, और हम और कितना अच्छा कर सकते हैं।

भगवद गीता का योग दर्शन

भगवद गीता का योग दर्शन बुद्धि, विवेक, कर्म, संकल्प और आत्म गौरव की एकस्वरता पर बल देता है. कृष्ण के मतानुसार मनुष्य के दुःख की जड़ें उसकी स्वार्थ लिप्तता में हैं जिन्हें वह चाहे तो स्वयं को योगानुकूल अनुशासित करके दूर कर सकता है. गीता के अनुसार मानव जीवन का लक्ष्य मन और मस्तिष्क को स्वार्थपूर्ण सांसारिक उलझावों से मुक्त करके अपने कर्मों को परम सत्ता को समर्पित करते हुए आत्म-गौरव को प्राप्त करना है. इसी आधार पर भक्ति-योग, कर्म-योग और ज्ञान-योग को भगवद गीता का केन्द्रीय-बिन्दु स्वीकार किया गया है. गीता का महत्त्व भारत में ब्राह्मणिक मूल के चिंतन में और योगी सम्प्रदाय में सामान रूप से देखा गया है. वेदान्तियों ने प्रस्थान-त्रयी के अपने आधारमूलक पाठ में उपनिषदों और ब्रह्मसूत्रों के साथ गीता को भी एक स्थान दिया है.

Monday, November 2, 2020

उपनिषद विद्या औऱ आधुनिक धर्म निरपेक्ष शिक्षा का अन्तर


भारत के क्रमबद्ध ज्ञान सृजन की कहानी वेदों से शुरू हुई....अर्जन में उसके पहले के लोगों से चली आती ज्ञान परम्परा का भी ख़्याल रखा ही होगा ऋषियों ने और शायद इसीलिये स्रजनकर्ताओं ने अपने नाम का कहीं ज़िक्र नहीं किया। आज के उपलब्ध चारों वेद को रूप देने के बाद भी नई पीढ़ी के ऋषियों ने उस ज्ञान को  अपने अनुसंधानों से पोषित किया....उन ज्ञानी ऋषियों ने अपने बारे न कुछ लिखा, न अपने शिष्यों को बताया और यही क्रम शतियों तक चलता रहा....
कल राकेश से बातचीत के सिलसिले में जब विषय आया किस तरह की शिक्षा की बात हमारे ऋषियों ने की. हाँ, वेदों के समय से कुछ ऋषि जहां जीवन सत्य की खोज में लगे जो आज विश्व द्वारा प्रशंसित है, वहीं कुछ अन्य खगोल एवं गणित विज्ञानों भी हज़ारों साल पहले पहुँचे जैसे सुलभशास्त्र, शून्य एवं अनन्त आदि से पता चलता है।पर लगता है उन्हें पराविद्या होने के कारण इतनी प्रसिद्धि नहीं मिली।

मंडूकोपनिषद् में बहुत साफ़ साफ़ दो तरह की विद्या का ज़िक्र है- परा विद्या एवं अपरा विद्या, जो यह भी बताता है कि उस समय में विद्या का क्षेत्र कितना बड़ा होता जा रहा था.
मंडूकोपनिषद् का श्लोक है: तत्रापरा ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्ववेदः शिक्शा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्दो ज्योतिषमिति।
अथ परा यया तदक्षरमधिगम्यते ॥१.५॥ मंडूकोपनिषद् 
उसमें अपरा है, ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द तथा ज्योतिष। और परा विद्या वह है जिससे 'अक्षर तत्त्व' का ज्ञान होता है। ‘अक्षर तत्त्व’ अध्यात्म ज्ञान है, जो  उस महत् ज्ञान को कहा गया है जिससे अमृतत्व पाया जा सकता है और सब दुखों से मुक्ति...। 
सोचने की बात है कि वेदों की विद्या को भी अपरा कहा गया जिसे आज सेक्यूलर शिक्षा या आधुनिक शिक्षा कहा जाता है। 

पर सबसे पुराने उपनिषदों में एक ईशोपनिषद् में प्रणेता ऋषि ने इसका खुलासा किया है कि दोनों विद्या एक दूसरे की पूरक हैं। यहाँ विद्या परा-विद्या ‘विद्या’ हैं एवं अपरा-विद्या ‘अविद्या’। 
श्लोक है: 
विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदोभ्य सह ।
अविद्यया मृत्युं तीर्त्वाऽमृतमश्नुते ॥११
जो तत् को इस रूप में जानता है कि वह एक साथ विद्या और अविद्या दोनों है, वह अविद्या से मृत्यु को पार कर विद्या से अमरता का आस्वादन करता है।
आज भी सफल सुखमय, शान्तिमय सांसारिक जीवन के लिये आध्यात्मिक विद्या की नींव पर आधुनिक विद्या पाना ज़रूरी है। इसीलिये ऐसी ही शिक्षा व्यवस्था की ज़रूरत है और होनी चाहिये। हमने आध्यात्मिक शिक्षा से जीवन में नैतिकता के मूल्यों को भूला दिया संविधान के ‘सेक्यूलर’ शब्द की परिभाषा ठीक से नहीं देने एवं समझने के कारण । ‘भारत माता’, या ‘वन्देमातरम्’ सेक्यूलर नहीं रहा, फिर रामायण रचयिता तुलसीदास, कबीर, रैदास,रसखान को कैसे रखा जाये हमारे स्कूल की शिक्षा में । उपनिषदों को कौन सेक्यूलर (धर्म-निरपेक्ष)कहने देगा आज के राजनीतिक माहौल में जहां सभी जीवन मूल्य वोट की तराज़ू पर तौला जाता हो...। जब ब्राह्मण असुरों के कार्यों को श्रेष्ठ मानने लगे हैं एवं उसके लिये वे शूद्र बनने पर तैयार हैं एवं शूद्र और अन्य पिछड़ी जातियाँ रैदास या अन्य संतों को नहीं, शवरी, निषाद्, या केवट को नहीं आज के स्वार्थी नेताओं को न समझ उन्हें ही भगवान माँगने लगी हैं। अल्प संख्यक न कबीर रसखान, रहीम या साँई बाबा को नहीं मानते अपने धर्म के ठेकेदारों की बात मानते हैं....पर जो इसके बारे में कोई राय जानना चाहते हैं वे श्री. M के नाम से प्रसिद्ध श्रध्येय मुमताज़ अली खान के उपनिषदों की किताबों एवं व्याख्यानों से क्यों नहीं कुछ सीखते...
विवेकानन्द ने बराबर यही प्रतिपादित किया। देश कब तक यह धर्म निरपेक्षता का पासा खेलते हुए देश के महाभारत युद्ध को ख़त्म ही नहीं होने देता...धर्म, जाति, रंग, प्रदेश, भाषा के नाम से जोड.....क्यों नहीं हम देशवासी भारतीय उपनिषद् के इन श्लोकों से सीख ले सकते....
यस्तु सर्वानि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति ।
सर्वभूतेषु चात्मान ततो न विजुगुप्सते ॥६॥
जो सभी जीवों में अवस्थित आत्मा को अपनी आत्मा से अलग नहीं मानता, जो अपनी आत्मा को सभी में देख सकता है वह कैसे एक दूसरे से घृणा या दुश्मनी कर सकता है.....
The Wise man, who realizes all beings as not distinct from his own Self, and his own Self as the Self of all beings, does not, by virtue of that perception, hate anyone.
यस्मिन्सर्वानि भूतानन्यात्मैवभुद्विजानतः ।
तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः ॥७॥
जो सभी में स्थित आत्मा को अपनी ही आत्मा की तरह जानता समझता है, कैसे अंधकार या शोक में रह सकता है।
What delusion, what sorrow can there be for that wise man who realizes the unity of all existence by perceiving all beings as his own Self?’
सभी उपनिषदों ने इसे बार बार दुहराया और भगवद्गीता भी...अगर दुनिया के लोग समझ जाते यह उपनिषद्ज्ञान, यह पूरे विश्व का कल्याण कर देता केवल भारत ही क्यों?
कहीं कोई भूल दिखती है तो कृपया बताने की कृपा करें, पर पहले समझने की कोशिश करें....
....

Saturday, October 12, 2019

राम और कृष्णा में अंतर

*महाभारत का एक सार्थक प्रसंग जो अंतर्मन को छूता है .... !!*🙏🙏

महाभारत युद्ध समाप्त हो चुका था. युद्धभूमि में यत्र-तत्र योद्धाओं के फटे वस्त्र, मुकुट, टूटे शस्त्र, टूटे रथों के चक्के, छज्जे आदि बिखरे हुए थे और वायुमण्डल में पसरी हुई थी घोर उदासी .... !  
गिद्ध , कुत्ते , सियारों की उदास और डरावनी आवाजों के बीच उस निर्जन हो चुकी उस भूमि में *द्वापर का सबसे महान योद्धा* *"देवव्रत" (भीष्म पितामह)* शरशय्या पर पड़ा सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा कर रहा था -- अकेला .... !

तभी उनके कानों में एक परिचित ध्वनि शहद घोलती हुई पहुँची , "प्रणाम पितामह" .... !!

भीष्म के सूख चुके अधरों पर एक मरी हुई मुस्कुराहट तैर उठी ,  बोले , " आओ देवकीनंदन .... !  स्वागत है तुम्हारा .... !!  

मैं बहुत देर से तुम्हारा ही स्मरण कर रहा था" .... !!

कृष्ण बोले ,  "क्या कहूँ पितामह ! अब तो यह भी नहीं पूछ सकता कि कैसे हैं आप" .... !

भीष्म चुप रहे , कुछ क्षण बाद बोले," पुत्र युधिष्ठिर का राज्याभिषेक करा चुके केशव ... ?  
उनका ध्यान रखना , परिवार के बुजुर्गों से रिक्त हो चुके राजप्रासाद में उन्हें अब सबसे अधिक तुम्हारी ही आवश्यकता है" .... !

कृष्ण चुप रहे .... !

भीष्म ने पुनः कहा ,  "कुछ पूछूँ केशव .... ?  
बड़े अच्छे समय से आये हो .... !  
सम्भवतः धरा छोड़ने के पूर्व मेरे अनेक भ्रम समाप्त हो जाँय " .... !!

कृष्ण बोले - कहिये न पितामह ....! 

एक बात बताओ प्रभु !  तुम तो ईश्वर हो न .... ?

कृष्ण ने बीच में ही टोका ,  "नहीं पितामह ! मैं ईश्वर नहीं ...  मैं तो आपका पौत्र हूँ पितामह ... ईश्वर नहीं ...."

 भीष्म उस घोर पीड़ा में भी ठठा के हँस पड़े .... !  बोले , " अपने जीवन का स्वयं कभी आकलन नहीं कर पाया कृष्ण , सो नहीं जानता कि अच्छा रहा या बुरा , पर अब तो इस धरा से जा रहा हूँ कन्हैया , अब तो ठगना छोड़ दे रे .... !! "

कृष्ण जाने क्यों भीष्म के पास सरक आये और उनका हाथ पकड़ कर बोले ....  " कहिये पितामह .... !"

भीष्म बोले , "एक बात बताओ कन्हैया !  इस युद्ध में जो हुआ वो ठीक था क्या .... ?"

  "किसकी ओर से पितामह .... ?  पांडवों की ओर से .... ?"

 " कौरवों के कृत्यों पर चर्चा का तो अब कोई अर्थ ही नहीं कन्हैया !  पर क्या पांडवों की ओर से जो हुआ वो सही था .... ?  आचार्य द्रोण का वध , दुर्योधन की जंघा के नीचे प्रहार , दुःशासन की छाती का चीरा जाना , जयद्रथ के साथ हुआ छल , निहत्थे कर्ण का वध , सब ठीक था क्या .... ?  यह सब उचित था क्या .... ?"

 इसका उत्तर मैं कैसे दे सकता हूँ पितामह .... !  
इसका उत्तर तो उन्हें देना चाहिए जिन्होंने यह किया ..... !!  
उत्तर दें दुर्योधन का वध करने वाले भीम , उत्तर दें कर्ण और जयद्रथ का वध करने वाले अर्जुन .... !! 

 मैं तो इस युद्ध में कहीं था ही नहीं पितामह .... !!

 "अभी भी छलना नहीं छोड़ोगे कृष्ण .... ?
 अरे विश्व भले कहता रहे कि महाभारत को अर्जुन और भीम ने जीता है , पर मैं जानता हूँ कन्हैया कि यह तुम्हारी और केवल तुम्हारी विजय है .... !  
मैं तो उत्तर तुम्ही से पूछूंगा कृष्ण .... !"

 "तो सुनिए पितामह .... !  
कुछ बुरा नहीं हुआ , कुछ अनैतिक नहीं हुआ .... ! 
 वही हुआ जो हो होना चाहिए .... !"

"यह तुम कह रहे हो केशव .... ?  
मर्यादा पुरुषोत्तम राम का अवतार कृष्ण कह रहा है ....?  यह छल तो किसी युग में हमारे सनातन संस्कारों का अंग नहीं रहा, फिर यह उचित कैसे गया ..... ? "

 *"इतिहास से शिक्षा ली जाती है पितामह , पर निर्णय वर्तमान की परिस्थितियों के आधार पर लेना पड़ता है .... !* 

 हर युग अपने तर्कों और अपनी आवश्यकता के आधार पर अपना नायक चुनता है .... !! 
 राम त्रेता युग के नायक थे , मेरे भाग में द्वापर आया था .... !  
हम दोनों का निर्णय एक सा नहीं हो सकता पितामह .... !!"

" नहीं समझ पाया कृष्ण ! तनिक समझाओ तो .... !"

" राम और कृष्ण की परिस्थितियों में बहुत अंतर है पितामह .... !  
राम के युग में खलनायक भी ' रावण ' जैसा शिवभक्त होता था .... !!  
तब रावण जैसी नकारात्मक शक्ति के परिवार में भी विभीषण जैसे सन्त हुआ करते थे ..... !  तब बाली जैसे खलनायक के परिवार में भी तारा जैसी विदुषी स्त्रियाँ और अंगद जैसे सज्जन पुत्र होते थे .... !  उस युग में खलनायक भी धर्म का ज्ञान रखता था .... !!
 इसलिए राम ने उनके साथ कहीं छल नहीं किया .... ! किंतु मेरे युग के भाग में में कंस , जरासन्ध , दुर्योधन , दुःशासन , शकुनी , जयद्रथ जैसे घोर पापी आये हैं .... !! उनकी समाप्ति के लिए हर छल उचित है पितामह .... ! पाप का अंत आवश्यक है पितामह , वह चाहे जिस विधि से हो .... !!"

 "तो क्या तुम्हारे इन निर्णयों से गलत परम्पराएं नहीं प्रारम्भ होंगी केशव .... ?  
क्या भविष्य तुम्हारे इन छलों का अनुशरण नहीं करेगा .... ?  
और यदि करेगा तो क्या यह उचित होगा ..... ??"

*" भविष्य तो इससे भी अधिक नकारात्मक आ रहा है पितामह .... !*  

*कलियुग में तो इतने से भी काम नहीं चलेगा .... !*
  
*वहाँ मनुष्य को कृष्ण से भी अधिक कठोर होना होगा ....  नहीं तो धर्म समाप्त हो जाएगा .... !*  

*जब क्रूर और अनैतिक शक्तियाँ  सत्य एवं धर्म का समूल नाश करने के लिए आक्रमण कर रही हों,  तो नैतिकता अर्थहीन हो जाती है पितामह* .... !  
तब महत्वपूर्ण होती है विजय , केवल विजय .... ! 

 *भविष्य को यह सीखना ही होगा पितामह* ..... !!"

"क्या धर्म का भी नाश हो सकता है केशव .... ? 
और यदि धर्म का नाश होना ही है , तो क्या मनुष्य इसे रोक सकता है ..... ?"

 *"सबकुछ ईश्वर के भरोसे छोड़ कर बैठना मूर्खता होती है पितामह .... !* 

 *ईश्वर स्वयं कुछ नहीं करता ..... !*केवल मार्ग दर्शन करता है*
  
*सब मनुष्य को ही स्वयं  करना पड़ता है .... !* 
आप मुझे भी ईश्वर कहते हैं न .... !  
तो बताइए न पितामह , मैंने स्वयं इस युद्घ में कुछ किया क्या ..... ?  
सब पांडवों को ही करना पड़ा न .... ? 
यही प्रकृति का संविधान है .... !  
युद्ध के प्रथम दिन यही तो कहा था मैंने अर्जुन से .... ! यही परम सत्य है ..... !!"

भीष्म अब सन्तुष्ट लग रहे थे .... ! 
उनकी आँखें धीरे-धीरे बन्द होने लगीं थी .... ! 
 उन्होंने कहा - चलो कृष्ण ! यह इस धरा पर अंतिम रात्रि है .... कल सम्भवतः चले जाना हो ... अपने इस अभागे भक्त पर कृपा करना कृष्ण .... !"

*कृष्ण ने मन मे ही कुछ कहा और भीष्म को प्रणाम कर लौट चले , पर युद्धभूमि के उस डरावने अंधकार में भविष्य को जीवन का सबसे बड़ा सूत्र मिल चुका था* .... !

*जब अनैतिक और क्रूर शक्तियाँ  सत्य और धर्म का विनाश करने के लिए आक्रमण कर रही हों, तो नैतिकता का पाठ आत्मघाती होता है ....।।*

*धर्मों रक्षति रक्षितः* 🚩🚩

Saturday, July 27, 2019

धर्म का स्वरूप

धर्म का स्वरूप क्या है? धर्म का क्या महत्व है? क्या धर्म देश-काल के अनुसार बदलता है? ये सवाल हजारों सालों से पूरी दुनिया को परेशान करते रहे हैं।

भारतीय संस्कृति में धर्म पर चिंतन कर सूक्ष्म विवेचन की परंपरा रही है। धर्म संपूर्ण जगत को धारण करता है, इसीलिए उसका नाम धर्म है। धर्म ने समस्त प्रजा को धारण कर रखा है। अत: जो धारण से युक्त हो, वही धर्म है।संसार में धर्म ही सबसे श्रेष्ठ है।

धर्म में ही सत्य की प्रतिष्ठा है। मरा हुआ धर्म हमें मारता है और हमसे रक्षित धर्म ही हमारी रक्षा करता है। इसलिए धर्म का हनन नहीं करना चाहिए।

यही सनातन भारतीय चिंतन परंपरा है, जो मानव जीवन के चार पुरुषार्थो में धर्म को पहला स्थान देती है। धर्म ही वह पहली सीढी है, जिसके अगले सोपानों में अर्थ और काम से होते हुए मानव अपने जीवन के परमलक्ष्य मोक्ष को प्राप्त कर सकता है। यह है " सनातन धर्म"।

मनुस्मृति में धर्म का स्वरूप उसके दस लक्षणों के माध्यम से बताया गया है -

धृति: क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिंद्रियनिग्रह:।

धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्॥

अर्थात धैर्य, क्षमा, संयम, अस्तेय (चोरी न करना), शौच (पवित्रता), इंद्रियों को वश में रखना, बुद्धि, विद्या, सत्य और क्रोध न करना - ये दस लक्षण हैं धर्म के और जिस मनुष्य में ये लक्षण हों, वही धार्मिक है। यही है सनातन धर्म का अनुयायी होना।

सन 1893 में स्वामी विवेकानंद ने शिकागो में आयोजित विश्व धर्म महासम्मेलन में उपस्थित विश्व के सभी धर्मगुरुओं के समक्ष भारतीय संस्कृति की विजय पताका फहराई।

उन्होंने बार-आर भारतीय जीवनदृष्टि का मूल आधार धर्म को बताया। उनके शब्दों में, हमारे पास एकमात्र सम्मिलन-भूमि है - हमारी पवित्र परंपरा, हमारा धर्म। भारत के भविष्य संगठन की पहली शर्त के तौर पर धार्मिक एकता की ही आवश्यकता है।

एशिया में और विशेषत: भारत में जाति, भाषा, समाज संबंधी सभी बाधाएं धर्म की इस एकीकरण शक्ति के सामने उड जाती हैं। धर्म ही भारतीय जीवन का मूल मंत्र है। हमारा धर्म ही हमारे तेज, हमारे बल, यहां तक कि हमारे जीवन की भी मूल भित्ति है।

मैं एक ऐसे धर्म का प्रचार करना चाहता हूं, जो सब प्रकार की मानसिक अवस्था वाले लोगों के लिए उपयोगी हो; इसमें ज्ञान, भक्ति, योग और कर्म समभाव से रहेंगे।

हमारा देश ही हमारा जागृत देवता है। देश के दरिद्रनारायण की सेवा ही सच्चा धर्म है। क्षुधातुरों को धर्म का उपदेश देना उनका अपमान करना है, भूखों को दर्शन सिखाना उनका अपमान करना है।

इस प्रकार स्वामी विवेकानंद ने धर्म को सामाजिक विकास तथा मानवमात्र की सेवा से जोडकर उसे नया अर्थ प्रदान किया। ऐसा है हमारा "सनातन धर्म"।

धर्म कभी धन के लिए न आचरित हो, वह श्रेय के लिए हो, प्रकृति के कल्याण के लिए हो, धर्म के लिए हो। इसका अनुपालन करना है "सनातन धर्म"।

परंतु आज भौतिकता के इस दौर में धर्म के नाम पर कई जगह व्यापार शुरू हो गया है।

आज कई ऐसे लोग आस्था-विश्वास के बाजार में आ बैठे हैं, जो शास्त्रों की मनमानी व्याख्या करते हैं। ढोंग-आडंबर का कपटजाल बिछाते हैं। आस्तिक एवं सीधे-सादे नागरिकों को फंसाते और अपने स्वार्थ साधते हैं।

वास्तव में साधू शब्द का अर्थ है - जिसने अपनी इंद्रियों को साध (वश में कर) लिया हो ।

महात्मा शब्द का अर्थ है- महान है जो आत्मा।

गुरु शब्द दो अक्षरों - गु (अंधकार) और रु (मिटाने वाला) के मेल से बना है, अर्थात गुरु वह है, जो अज्ञान के अंधकार को मिटाकर ज्ञान के सही मार्ग पर ले चले, किंतु आज क्या स्थिति है, यह किसी से छिपा नहीं है।

स्वतंत्रता के बाद भारत में धर्म का जितना दुरुपयोग राजनीति ने किया, शायद ही किसी और ने किया हो। धर्म के नाम पर संकीर्ण सोच को बढावा देने, लोगों को एक-दूसरे के खिलाफ भडकाने जैसे घृणित कार्य किए गए। फिर भी अपनी निर्मलता और श्रेष्ठता को स्थिर रखे हुए है वह है, "सनातन धर्म"।

कोई भी धर्म बैर भाव, घृणा, हिंसा आदि नहीं सिखाता। सभी धर्म प्रेम, भाईचारा, सद्भाव, सहनशीलता, मेलजोल की ही सीख देते हैं।

सभी पर्व असत्य पर सत्य, अधर्म पर धर्म की विजय की ही गाथा गाते हैं, फिर भी हम आधुनिक वैज्ञानिक शिक्षित समाज में धर्म के नाम पर हो रहे इन सारे छल, कपट, अन्याय, अत्याचार को बर्दाश्त कर रहे हैं?

जरूरत इस बात की है कि हम स्वयं यह प्रण लें कि धर्म के नाम पर कट्टरता, कटुता, द्वेष-घृणा फैलाने वाली ताकतों के नापाक इरादों को कभी सफल नहीं होने देंगे तथा पूरे विश्व के सभी धर्मो को सम्मान देने वाली धर्म की धरा - भारतवर्ष को एक बार फिर से जाग्रत करेंगे। इस प्रतिज्ञा पर अडिग रहना सिखाता है, " सनातन धर्म"।

हमारा सबका सनातन धर्म ही वास्तविक धर्म है, यह बात हम सब को समझनी होगी। तभी हमारे भारत से ही पुन: पूरे विश्व को शांति, अहिंसा, सदाचार का संदेश मिलेगा। यही अवधारणा है "सनातन धर्म की"।

"प्राणी मात्र को निम्नतम से उच्चतम की तरफ अग्रसर करना" दैहिक, दैविक और भौतिक, मानसिक, वाचिक और क्रमिक हर तरह से सन्मार्ग की तरफ उन्मुख करना, सन्मार्ग के लिए प्रेरित करना। जो यह कार्य करने के लिए प्रेरित करे वह है,"सनातन धर्म"।
।।जयति सनातन धर्म।।