Tuesday, November 17, 2020
धर्म का स्वरुप
Tuesday, November 3, 2020
आध्यत्मिकता
भगवद गीता का योग दर्शन
Monday, November 2, 2020
उपनिषद विद्या औऱ आधुनिक धर्म निरपेक्ष शिक्षा का अन्तर
Saturday, October 12, 2019
राम और कृष्णा में अंतर
Saturday, July 27, 2019
धर्म का स्वरूप
धर्म का स्वरूप क्या है? धर्म का क्या महत्व है? क्या धर्म देश-काल के अनुसार बदलता है? ये सवाल हजारों सालों से पूरी दुनिया को परेशान करते रहे हैं।
भारतीय संस्कृति में धर्म पर चिंतन कर सूक्ष्म विवेचन की परंपरा रही है। धर्म संपूर्ण जगत को धारण करता है, इसीलिए उसका नाम धर्म है। धर्म ने समस्त प्रजा को धारण कर रखा है। अत: जो धारण से युक्त हो, वही धर्म है।संसार में धर्म ही सबसे श्रेष्ठ है।
धर्म में ही सत्य की प्रतिष्ठा है। मरा हुआ धर्म हमें मारता है और हमसे रक्षित धर्म ही हमारी रक्षा करता है। इसलिए धर्म का हनन नहीं करना चाहिए।
यही सनातन भारतीय चिंतन परंपरा है, जो मानव जीवन के चार पुरुषार्थो में धर्म को पहला स्थान देती है। धर्म ही वह पहली सीढी है, जिसके अगले सोपानों में अर्थ और काम से होते हुए मानव अपने जीवन के परमलक्ष्य मोक्ष को प्राप्त कर सकता है। यह है " सनातन धर्म"।
मनुस्मृति में धर्म का स्वरूप उसके दस लक्षणों के माध्यम से बताया गया है -
धृति: क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिंद्रियनिग्रह:।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्॥
अर्थात धैर्य, क्षमा, संयम, अस्तेय (चोरी न करना), शौच (पवित्रता), इंद्रियों को वश में रखना, बुद्धि, विद्या, सत्य और क्रोध न करना - ये दस लक्षण हैं धर्म के और जिस मनुष्य में ये लक्षण हों, वही धार्मिक है। यही है सनातन धर्म का अनुयायी होना।
सन 1893 में स्वामी विवेकानंद ने शिकागो में आयोजित विश्व धर्म महासम्मेलन में उपस्थित विश्व के सभी धर्मगुरुओं के समक्ष भारतीय संस्कृति की विजय पताका फहराई।
उन्होंने बार-आर भारतीय जीवनदृष्टि का मूल आधार धर्म को बताया। उनके शब्दों में, हमारे पास एकमात्र सम्मिलन-भूमि है - हमारी पवित्र परंपरा, हमारा धर्म। भारत के भविष्य संगठन की पहली शर्त के तौर पर धार्मिक एकता की ही आवश्यकता है।
एशिया में और विशेषत: भारत में जाति, भाषा, समाज संबंधी सभी बाधाएं धर्म की इस एकीकरण शक्ति के सामने उड जाती हैं। धर्म ही भारतीय जीवन का मूल मंत्र है। हमारा धर्म ही हमारे तेज, हमारे बल, यहां तक कि हमारे जीवन की भी मूल भित्ति है।
मैं एक ऐसे धर्म का प्रचार करना चाहता हूं, जो सब प्रकार की मानसिक अवस्था वाले लोगों के लिए उपयोगी हो; इसमें ज्ञान, भक्ति, योग और कर्म समभाव से रहेंगे।
हमारा देश ही हमारा जागृत देवता है। देश के दरिद्रनारायण की सेवा ही सच्चा धर्म है। क्षुधातुरों को धर्म का उपदेश देना उनका अपमान करना है, भूखों को दर्शन सिखाना उनका अपमान करना है।
इस प्रकार स्वामी विवेकानंद ने धर्म को सामाजिक विकास तथा मानवमात्र की सेवा से जोडकर उसे नया अर्थ प्रदान किया। ऐसा है हमारा "सनातन धर्म"।
धर्म कभी धन के लिए न आचरित हो, वह श्रेय के लिए हो, प्रकृति के कल्याण के लिए हो, धर्म के लिए हो। इसका अनुपालन करना है "सनातन धर्म"।
परंतु आज भौतिकता के इस दौर में धर्म के नाम पर कई जगह व्यापार शुरू हो गया है।
आज कई ऐसे लोग आस्था-विश्वास के बाजार में आ बैठे हैं, जो शास्त्रों की मनमानी व्याख्या करते हैं। ढोंग-आडंबर का कपटजाल बिछाते हैं। आस्तिक एवं सीधे-सादे नागरिकों को फंसाते और अपने स्वार्थ साधते हैं।
वास्तव में साधू शब्द का अर्थ है - जिसने अपनी इंद्रियों को साध (वश में कर) लिया हो ।
महात्मा शब्द का अर्थ है- महान है जो आत्मा।
गुरु शब्द दो अक्षरों - गु (अंधकार) और रु (मिटाने वाला) के मेल से बना है, अर्थात गुरु वह है, जो अज्ञान के अंधकार को मिटाकर ज्ञान के सही मार्ग पर ले चले, किंतु आज क्या स्थिति है, यह किसी से छिपा नहीं है।
स्वतंत्रता के बाद भारत में धर्म का जितना दुरुपयोग राजनीति ने किया, शायद ही किसी और ने किया हो। धर्म के नाम पर संकीर्ण सोच को बढावा देने, लोगों को एक-दूसरे के खिलाफ भडकाने जैसे घृणित कार्य किए गए। फिर भी अपनी निर्मलता और श्रेष्ठता को स्थिर रखे हुए है वह है, "सनातन धर्म"।
कोई भी धर्म बैर भाव, घृणा, हिंसा आदि नहीं सिखाता। सभी धर्म प्रेम, भाईचारा, सद्भाव, सहनशीलता, मेलजोल की ही सीख देते हैं।
सभी पर्व असत्य पर सत्य, अधर्म पर धर्म की विजय की ही गाथा गाते हैं, फिर भी हम आधुनिक वैज्ञानिक शिक्षित समाज में धर्म के नाम पर हो रहे इन सारे छल, कपट, अन्याय, अत्याचार को बर्दाश्त कर रहे हैं?
जरूरत इस बात की है कि हम स्वयं यह प्रण लें कि धर्म के नाम पर कट्टरता, कटुता, द्वेष-घृणा फैलाने वाली ताकतों के नापाक इरादों को कभी सफल नहीं होने देंगे तथा पूरे विश्व के सभी धर्मो को सम्मान देने वाली धर्म की धरा - भारतवर्ष को एक बार फिर से जाग्रत करेंगे। इस प्रतिज्ञा पर अडिग रहना सिखाता है, " सनातन धर्म"।
हमारा सबका सनातन धर्म ही वास्तविक धर्म है, यह बात हम सब को समझनी होगी। तभी हमारे भारत से ही पुन: पूरे विश्व को शांति, अहिंसा, सदाचार का संदेश मिलेगा। यही अवधारणा है "सनातन धर्म की"।
"प्राणी मात्र को निम्नतम से उच्चतम की तरफ अग्रसर करना" दैहिक, दैविक और भौतिक, मानसिक, वाचिक और क्रमिक हर तरह से सन्मार्ग की तरफ उन्मुख करना, सन्मार्ग के लिए प्रेरित करना। जो यह कार्य करने के लिए प्रेरित करे वह है,"सनातन धर्म"।
।।जयति सनातन धर्म।।
Wednesday, December 5, 2018
भगवद गीता का बायोटेक्नोलॉजी का वैज्ञानिक सिद्धान्त
भगवान श्रीकृष्ण ने भगवद गीता में बताया था बॉयोटेक्नोलॉजी का वैज्ञानिक सिद्धांत
आज हम भले ही स्कूल कॉलेजों में जीवन की उत्पत्ति, अनुवांशिकी जैसे आधुनिक विज्ञान के सिद्धांतों की खोज के लिए जार्ज मेंडल, वाट्सन और क्रिक जैसे महान वैज्ञानिकों का नाम पढ़ते हैं, लेकिन यदि हम अपने धर्म ग्रंथों का गहन अध्धयन करें तो पाते हैं कि ये सिद्धांत तो करीब 5000 साल पहले भगवान श्रीकृष्ण ने प्रतिपादित कर दिए थे। श्रीमद्भागवत गीता में कई ऐसे गूढ़ श्लोक हैं जो आधुनिक विज्ञान के कई जटिल सिद्धांतों को खुद में समेटे हुए हैं। श्रीमद् भागवत गीता सिर्फ एक दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक ही नही बल्कि एक विज्ञान ग्रंथ भी है।
भगवान श्रीकृष्ण ने वैज्ञानिक दृष्टिकोण के आधार पर कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन को ज्ञान दिया था। यह ज्ञान आज कई वैज्ञानिक अवधारणाओं का जनक है। श्रीमद् भागवत गीता के सात श्लोकों में जीवन की उत्पत्ति का पूरा सार है। इन श्लोकों की मीमांसा बताती है कि अर्जुन को कुरुक्षेत्र के मैदान में ही भगवान श्रीकृष्ण ने मानव की उत्पत्ति का विज्ञान बता दिया था। सामवेद के तीसरे अध्याय के 10वें खंड में पहला व नौवां श्लोक पांच तत्वों की पुष्टि करता है। जीव आत्मा अणु और परमाणु से बनी है। नौवें श्लोक में ईश्वर ने सृष्टि का निर्माण अणु और परमाणु के रूप में किया है।
ये हैं सात श्लोक
1- मय्यासक्तामना: पार्थ योग युजजन्मदाश्रय:।
असंशय समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु।।
इस श्लोक में शरीर की आंतरिक ऊर्जा के आधार के बारे में बताया गया है। जिसे वैज्ञानिक भाषा में माइटोकोंड्रिया कहते हैं। यही शरीर में ऊर्जा पैदा करने वाला एडीनोसिन ट्राई फॉस्फेट पैदा करता है।
2- ज्ञानं तेहं सविज्ञामिदं वक्ष्याम्यशेषत:।
यज्ञात्वा नेह भूयोन्यज ज्ञातव्यमविशष्यते।।
इस श्लोक में सृष्टि निर्माण की प्रक्रिया को बताया गया है। पृथ्वी पर निर्जीव से जीव की उत्पत्ति के बारे में जानकारी दी और बताया कि वह कौन से कण थे, जिनसे शरीर का निर्माण हुआ।
3- मनुष्याणां सहस्त्रेषु कशिचद्यतति सद्धिये।
यततामिप सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्वत:।।
तीसरे श्लोक में तत्व ज्ञान को विस्तार से समझाया गया है। यह भी बताया गया है कि तत्व ज्ञान समझना ही दुष्कर है। इसे जिसने समझ लिया, उसे कुछ और जानने की जरूरत नहीं।
4- भूमिरापोनलो वायु: खं मनो बुद्धिरेव च।
अहंकार इतीयं में भिन्ना प्रकृतिरष्टयां।।
5- अपरेयमितस्त्वन्यां प्रर्कृंत विद्वि में पराम।
जीवभूतां महाबाहों ययेदं धार्यते जगत्।।
चौथे और पांचवें श्लोक में कई ऐसी बातें कही हैं जिससे सिद्ध होता है कि लगभग पांच हजार वर्ष पूर्व भगवान श्रीकृष्ण ने गुणसूत्र के बारे में भी जानकारी दी थी।
6- एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय।
अहं कृत्स्नस्य जगत: प्रभव: प्रलयस्तथा।
7- मत्त परतरं नान्यत् किचिदस्ति धनंजय।
मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव।।
छठे और सातवें श्लोक में उत्पत्ति का आधार तत्वों को बताया। इस श्लोक में बताया है कि मृत्यु शरीर की होती है, शरीर के अंदर मौजूद तत्वों की नहीं, जिसे आत्मा कहते हैँ।
यही बात आधुनिक विज्ञान भी कहता है कि डीएनए कभी नहीं बदलता है। चाहे किसी भी रूप में मृत्यु हो, जबकि यही बात गीता में श्रीकृष्ण ने बहुत पहले ही बता दी थी।
डीएनए- वैज्ञानिक सिद्धांत के अनुसार सूत्र का सूत्र में मणियों की तरह गुथा होना है।
श्रीकृष्ण के अनुसार सूत्र में सूत्र के मणियों के सदृश मुझमें गुथा हुआ है। यानी जीव में विद्यमान है।
यह श्लोक डीएनए को ही परिभाषित करता है। भगवान श्रीकृष्ण के इसी वाक्य को अगर हम बॉयोकेमेस्ट्री की किसी भी पुस्तक में देखते हैं, तो वहां इसे हैम "स्ट्रिंग्स ऑन द रॉल्स" नाम से अंग्रेजी में पढ़ते हैं।
भगवान श्रीकृष्ण ने डीएनए की रासायनिक प्रकृति को कुछ इस तरह समझाया है। यहां मणि रूप का मतलब डीएनए जो कि केमिकल थ्रेड (धागों) से मिलकर बना है। यहां धागों का मतलब बॉडिंग से है कि किस तरह से निर्जीव पदार्थ आपस में जुड़कर जीवन का निर्माण करते है।
इसलिये ही सनातन धर्म ब्रह्माण्ड का सबसे प्राचीन, विकसित और वैज्ञानिक धर्म है।
।।जयति सनातन धर्म।।